रविवार, 24 मार्च 2013

सन्भल के चलअ बबुआ





सन्भल के चलअ बबुआ
शहर के डगरिया बा पुरानी
यहाँ जंगल बसल बा
बस कहे के ,नाम राजधानी
जो अब हम कहत बानी
ई बात बा बहुत पुरानी
पहिले ई शहर रहे जंगल
जंगल पर रहे भरपूर जवानी
तब ही सरकार के सूझल
एक समझदार नादानी
जंगल हटा के बन गईल शहर
फिर ई बनल राजधानी
पर संसद से जानवर के बोली
हम आज भी सुनत बानी
सन्भल के चलअ बबुआ
शहर के डगरिया बा पुरानी
यहाँ जंगल बसल बा
बस कहे के ,नाम राजधानी



अंधेर नगरी और चौपट राजा
के सुनल होवे कहानी
       पर यहाँ अंधरिया रात में
दिया जलावे के ना करीह नादानी
सन्भल के चलअ बबुआ
शहर के डगरिया बा पुरानी
यहाँ जंगल बसल बा
बस कहे के ,नाम राजधानी


 

ये हादसे सरकारी



कुछ हादसे,कुछ साजिशे
कहीं दोस्ती कहीं रंजिशे
मिलती यहाँ कभी जिंदगी
कभी जिंदगी से आज़ादी
               ये हादसे सरकारी
               ये साजिशे दरबारी
कुछ दास्ताँ कुछ अनकहे
सबने सुना पर चुप रहे
कहलाते यहाँ विद्रोही वही
कल तक जो थे क्रांतिकारी
               ये हादसे सरकारी
               ये साजिशे दरबारी
कुछ विद्रोह है ,कुछ तारीफें
कभी दबे ,कभी पले बढे
हर दिल में है रोष मगर
जनता बनती यहाँ बेचारी
               ये हादसे सरकारी
               ये साजिशे दरबारी
-    अभिषेक कुमार सिन्हा

मैं हूँ दिल्ली

मैं हूँ दिल्ली,और ये आवाम आमीन मेरी है
गुनाह के बाजू पे पडी, वो आस्तीन मेरी है
पता नहीं ,मेरी कुछ जागीरें कब छीन गईं
पर मैं दिल्ली हूँ, और ये ज़मीन मेरी है

न किसी हमसफ़र , न किसी हमनशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा ,बस हमीं से निकलेगा
मेरी कोख में ही बिटिया रज़िया सुल्तान रहती थी
तलाश करो ,इस्मत का खज़ाना यहीं से निकलेगा