मैं हूँ दिल्ली,और ये आवाम आमीन मेरी है
गुनाह के बाजू पे पडी, वो आस्तीन मेरी है
पता नहीं ,मेरी कुछ जागीरें कब छीन गईं
पर मैं दिल्ली हूँ, और ये ज़मीन मेरी है
न किसी हमसफ़र , न किसी हमनशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा ,बस हमीं से निकलेगा
मेरी कोख में ही बिटिया रज़िया सुल्तान रहती थी
तलाश करो ,इस्मत का खज़ाना यहीं से निकलेगा
गुनाह के बाजू पे पडी, वो आस्तीन मेरी है
पता नहीं ,मेरी कुछ जागीरें कब छीन गईं
पर मैं दिल्ली हूँ, और ये ज़मीन मेरी है
न किसी हमसफ़र , न किसी हमनशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा ,बस हमीं से निकलेगा
मेरी कोख में ही बिटिया रज़िया सुल्तान रहती थी
तलाश करो ,इस्मत का खज़ाना यहीं से निकलेगा
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