कुछ हादसे,कुछ
साजिशे
कहीं दोस्ती कहीं
रंजिशे
मिलती यहाँ कभी
जिंदगी
कभी जिंदगी से आज़ादी
ये हादसे सरकारी
ये साजिशे दरबारी
कुछ दास्ताँ कुछ
अनकहे
सबने सुना पर चुप
रहे
कहलाते यहाँ
विद्रोही वही
कल तक जो थे
क्रांतिकारी
ये हादसे सरकारी
ये साजिशे दरबारी
कुछ विद्रोह है ,कुछ
तारीफें
कभी दबे ,कभी पले
बढे
हर दिल में है रोष
मगर
जनता बनती यहाँ
बेचारी
ये हादसे सरकारी
ये साजिशे दरबारी
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अभिषेक कुमार सिन्हा
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