सोमवार, 12 अप्रैल 2010

ऐ मेरी परी , तू कभी ना घबराना

ऐ मेरी परी , तू कभी ना घबराना
अश्क से इश्क का है रिश्ता पुराना

अभी मिलन पथ पर कोहरे घने हैं
हर संभव दुर्घटना के आसार बने हैं
कभी उठती आशंकाएं तो कभी बाधायें
और सभी हमें दोषी मानकर तने हैं
पर जिनको हाल-ए-दिल पता नहीं है
उनकी बात ; क्या दिल से लगाना
ऐ मेरी परी , तू कभी ना घबराना
अश्क से इश्क का है रिश्ता पुराना

मेरा प्यार अदा का दीवाना नहीं है
महज जरूरत का निशाना नहीं है
वक्त के साथ स्वतः ही ये पनपा
बलात् कोशिशों का फ़साना नहीं है
आपही जन्मी चीजें , शाश्वत होती हैं अक्सर
मुमकिन नहीं है होता इन्हें मिटाना
ऐ मेरी परी , तू कभी ना घबराना
अश्क से इश्क का है रिश्ता पुराना

मेरा दिल था गीली मिट्टी का टुकड़ा
तेरी मूर्ति को जब इसने मजबूती से जकडा
वक्त की आग से अब पथराई मिट्टी
बहुत मुश्किल है अब मूर्ति को हटाना
लाख कोशिशों से भी हटाया गया तो
नामुमकिन ही होगा , दूसरे को बिठाना
ऐ मेरी परी , तू कभी ना घबराना
अश्क से इश्क का है रिश्ता पुराना

ये मुश्किलें कतई हमारी दुश्मन नहीं हैं
बगैर इनके प्यार में गहराई मुमकिन नहीं है
काम है इनका बस , मिलन सुख बढाना
हारकर है इन्हें एक दिन लौट जाना
बिन इनके नीरस होती हमारी कहानी
अब होगा यादगार अपना भी फ़साना
ऐ मेरी परी , तू कभी ना घबराना
अश्क से इश्क का है रिश्ता पुराना

- अभिषेक कुमार सिन्हा

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

समीक्षा


तन्हाई तू शाश्वत कविता है

मोहब्बत एक अबूझ पहेली है

हमने सुना था इश्क में साथ मगर

हमारी कथा तो बिलकुल अकेली है

ऐसा नहीं है कि हम किसी के

कोई कभी हमारे नहीं हुए

हाँ जिसकी कश्ती में थे सवार

उस दरिया के कभी किनारे नहीं हुए

किसे दोष दूँ ,कभी समझ नहीं आया

कभी खुद को,तो कभी उसे दोषी पाया

जब परखा तो प्यार में हमने

खुद को ही लाभ हानि जोड़ते पाया

शायद हमारे प्यार में सवाल ज्यादा था

या कहें पूर्णता का ख्याल ज्यादा था

खुद अपूर्ण था हर कोई लेकिन

दूसरे की अपूर्णता पर बवाल ज्यादा था

- अभिषेक कुमार सिन्हा

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

आसार अभी तक बाकी है

मेरी कविता समर्पित है इकबाल को जिन्होंने कहा

“ वतन की फ़िक्र कर नादाँ ; मुसीबत आने वाली है

तेरी बर्बादियो के चर्चे है आसमानों में ,

अभी संभलो, वर्ना मिट जाओगे ; ये हिन्दुस्ताँ वालो

तेरा नामोनिशाँ भी ना होगा दास्तानों में “

आसार अभी तक बाकी है


आसार अभी तक बाकी है ;

माना कि मौकापरस्त राजनीति मुखौटे बदलकर छल रही है

इस देश में बंधुता स्थानीय कट्टरता के तले पल रही है ;

रोज वोट बैंक को लुभाने के स्वांग रचाए जाते है

चर्चा पाने के लिए हस्ती निशाना बनाये जाते है ;

आतंकवाद के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया जाता है

निज मुल्क में ही लोगों को प्रवासी बतलाया जाता है ;

मुंबई में जब जय महाराष्ट्र जय हिंद से बडा है ,

तो देश की अखंडता के सामने एक प्रश्न खड़ा है ;

पर देश प्रणेता मन – मोहन बंशी बजा रहा है

कोई अपने सरकार होने की खुशी मना रहा है

जब मराठी गौरव केवल एक व्यक्ति में समा रहा है

तब क्यों मराठी मानुष इनको अपनी आवाज बना रहा है

सच में मुझे इतंजार है उस मराठी मानुष का

जिसकी नौकरी मैंने छीनी है;

क्या शिवाजी की इन अवैध संतानों की तरह

उसकी भी आरजू कमीनी है;

वीरता नहीं, परदेस में जीविका कमा रहे

परप्रांती के घावों पर चोट करना है !

वीरता अस्सी साल की उम्र में अंग्रेजों से लड़कर

अपना हाथ गंगा को भेंट करना है!

यह बिहारी जीवटता का ही प्रमाण है ,

अनगिनित सूखे के बाद भी आत्महत्या का ना नामोनिशान है ;

अगर तुम अस्मिता की बात करते हो

तो कहानी अभी तक अधूरी है;

क्योंकि सम्पूर्ण चित्र जानने के लिए

मेरी बात भी सुननी जरुरी है;

मुझे शिवाजी की वीरता पर कोई शंका नहीं

पर शिवाजी जिन मुगलों से लगातार संघर्षरत थे;

उस हुमायूँ से जाकर पूछो

जीवनकाल में वे सत्ता से क्यों विरत थे;

उन दिनों भी बुद्ध और महावीर की धरती पर

अशोक ,चंद्रगुप्त मौर्य का शौर्य प्रभावी था ;

इसलिए कोलकाता से पेशावर तक की सड़के

बनवाने वाला शेरशाह शूरी मुगलों पर भारी था;

लेकिन मैं वह नहीं ,जो इतिहास की याद दिलाकर

सबको मोह पाश में घेर ले ;

और स्वर्णिम इतिहास की मुख कर

आज की सच्चाई से मुँहं फेर ले ;

मैं मानता हूँ कि मेरा प्रदेश

विकास के आँकडों में नीचे खड़ा है;

विदेशी निवेश की सपन्नता से दूर

अकाल तथा बाढ़ के बीच पडा है;

राज्यमार्ग और इमारते को देख तुम फुल रहे हो

अपनी वास्तविकता को ही भूल रहे हो

हमारे गाँवो की तरह तुम्हारे गाँव भी

उसी विपन्नता में लिप्त पड़े हैं

आजादी के इतने वर्षों बाद भी

विकास से दूर शापित खडें हैं ;

इसकी जडों तक जायोगे तब मालूम होगा

हमारी विकास नीति अंग्रेजों की दी हुई बैसाखी है;

अंगेजो की गुलामी नीति से आजादी पा ली मगर

उनकी गुलाम रीत से बंधन अभी तक बाकी है ;

आसार अभी तक बाकी है;

आजादी के पचास वर्षों में

आजादी का उद्देश्य ही खो गया ;

हम भूल कर बैठे इसलिए

भगत के सपने पर बाजार हावी हो गया;

जब विकास का मतलब ही पश्चिम हो गया

तो गंगा की तटीय घाटी को उद्योगों के बीच खोना ही था ;

और पश्चिम से जोड़ने वाली मछुआरों की इस भूमि को

देश में सबसे ज्यादा समृद्ध और विकसित होना ही था ;

हमारी दशा में न केवल पश्चिमीकरण प्रमाण है

वरन् इसमें हमारे अपनों का भी योगदान है;

अब मैं वह नीति बताता हूँ

जो हमे ठगने के लिए अपनाई गई;

अभी नहीं संभले तो कल तुम भी कहोगे

यही हमारे साथ भी दुहराई गई;

एक समय था जब तीन दशक की सत्ता से

उत्पन्न मद अपने अंहकार में चूर था;

वह अपने विरोधी ही नहीं

जनमानस की आवाज दबाने को आतुर था;

उस समय लोकनायक का स्वर बिहार से उभरा था

और लोहिया के हुंकारो का प्रभाव गगन पे गहरा था

उसी आंदोलन में कुद कुछ नापाक लोग

आंदोलन के अधिकारी बन गए ;

जयप्रकाश जिन्दाबाद कर करके

जयप्रकाश के उतराधिकारी बन गए;

अपने स्वर को कठोरता से उभारो वर्ना

तुम भी कहोगे कुछ साल बाद

शिवाजी महाराज की जय बोलकर

समाज के अपराधी ,सत्ता के अधिकारी बन गए ;

गरीबी में पले बढे ये नेता भी

कुर्सी पा सत्ता के नशे में धुत्त हो गए ;

इसानियत के सवेंदना को मारकर

जिन्दा इंसान से मुर्दा बुत हो गए ;

कुर्सी पाते ही इनका स्वार्थ

लोहिया के सपनो पर प्रभावी हो गया ;

अम्बेदकर के लोगो के लिए काम करना छोड़

अम्बेदकर की मूर्ति लगाने का फैशन हावी हो गया;

उस समय अम्बेदकर और कांशीराम को

अपने सपने पर कितनी तरस आती है;

जब दलित चंद रुपये में जीवन काटते है

और उनकी नेत्री करोडो रुपयों से जन्मदिन मानती है;

पर सत्ता के इन धिनौने पन्नों के बीच

इन्सानीयत का आधार अभी तक बाकी है ;

आसार अभी तक बाकी है;

नफरत और हिंसा की हमारे समाज में स्वीकारता नहीं है,

शिवाजी की महानता सबको बताने की आवश्यकता नहीं है,

जब हमारे सामने आतंकवाद की चुनौती है

और मँहगाई मुँहं बांये खड़ी है;

उस समय विदर्भ में हो रही आत्महत्याऐ

बम्बई को मुंबई कहने की अनिवार्यता से बड़ी है;

हम समझते है आपके अंतस्थल में

रची बसी है; ये भावनाये लेकिन

उस कठोर स्वर से उभरी

क्रांति का उद्गार अभी तक बाकी है;

आसार अभी तक बाकी है;

- अभिषेक कुमार सिन्हा

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

प्रत्याशा

प्रत्याशा

भँवर के हर मंजर में, उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

जो मैं हूँ दरअसल वो मैं नहीं हूँ

मैं वह हूँ ,जो बनना चाहता हूँ

कभी भविष्य में जाती मति है

कभी यादों में ही जीना चाहता हूँ

समय के इस च्रक में उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

मौत की कल्पना नहीं डराती मुझे

हालाकि जिंदगी कई बार डरा चुकी है

असीम दुःख के पलों में रोया नहीं

पर खुशी कई बार रुला चुकी है

सुख दुःख की उलटी अवधारणा में , उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

जज्बात की अदालत में फैसला हुआ जब

हर हालात में दोषी पाया खुद को ही

स्वयं के खडा हो सकूँ ,ऐसा हुआ कब

हर हाल किस्मत कोसती मुझ को ही

ग्लानि की इस वेदना में उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

भीड़ में खोने की हर कोशिश की ,लेकिन

स्वयं से दूर होकर भी उससे दूर नहीं रहता

हँसने की हर कोशिश बेकार हुई ,क्योकि

जिन आँखों में हो आँसू उनमे नूर नहीं रहता

खोखली हँसी की महफ़िल में उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

सुना था , मय के प्याले यादें बिसराते हैं

पर हमारी दशा में ये अपमानित लौट आतें हैं

क्षमा चाहता हूँ मैं काव्य विधा से ,लेकिन

ये सच है , ये भी असहाय खुद को पाते हैं

दर्द से उबरने की कोशिश में उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

- अभिषेक कुमार सिन्हा