शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

प्रत्याशा

प्रत्याशा

भँवर के हर मंजर में, उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

जो मैं हूँ दरअसल वो मैं नहीं हूँ

मैं वह हूँ ,जो बनना चाहता हूँ

कभी भविष्य में जाती मति है

कभी यादों में ही जीना चाहता हूँ

समय के इस च्रक में उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

मौत की कल्पना नहीं डराती मुझे

हालाकि जिंदगी कई बार डरा चुकी है

असीम दुःख के पलों में रोया नहीं

पर खुशी कई बार रुला चुकी है

सुख दुःख की उलटी अवधारणा में , उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

जज्बात की अदालत में फैसला हुआ जब

हर हालात में दोषी पाया खुद को ही

स्वयं के खडा हो सकूँ ,ऐसा हुआ कब

हर हाल किस्मत कोसती मुझ को ही

ग्लानि की इस वेदना में उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

भीड़ में खोने की हर कोशिश की ,लेकिन

स्वयं से दूर होकर भी उससे दूर नहीं रहता

हँसने की हर कोशिश बेकार हुई ,क्योकि

जिन आँखों में हो आँसू उनमे नूर नहीं रहता

खोखली हँसी की महफ़िल में उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

सुना था , मय के प्याले यादें बिसराते हैं

पर हमारी दशा में ये अपमानित लौट आतें हैं

क्षमा चाहता हूँ मैं काव्य विधा से ,लेकिन

ये सच है , ये भी असहाय खुद को पाते हैं

दर्द से उबरने की कोशिश में उठती है यही प्रत्याशा

यह जिंदगी की निराशा है या कवि बनने की आशा

- अभिषेक कुमार सिन्हा

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