वर्षा - क्षितिज
ऐ वारिद ,बरसा ऐसा वारि
भर दे धरणी की क्याँरी क्याँरी;
सरिता में भावना सी उफान हो
हृदय में संवेदना का तूफान हो ;
व्योम धरा के इस मधुर मिलन में
प्रतीत हो हर सुरभि न्यारी;
ऐ वारिद ,बरसा ऐसा वारि
मुझे भी ले चल संग अपने
उन्मुक्तता में देखूँ सपने ,
कर अपने अल्हड़पन का अंशदान;
करा मुझे दीवानगी का ज्ञान
मेरे मन की चंचलता को
अपने शिलाओं संग उड़ने दे ;
मेरे ह्रदय की वेदना का संताप
गलित होकर बरसने दे ;
मैं क्षितिज की राह देखता आकाश
मेरे दृगो में है आकंठ प्यास ;
धरा की कंचन काया की कमनीयता
करती है मेरे ह्रदय पर प्रहार ;
उसकी सरस वाणी की मधुरता
जैसे बसंत की रंगीन बयार ;
उनके स्नेहिल पंखों के सदृश नयन
उसके अनंत में खोता मेरा मन ;
उनके रूप यौवन की झील में ,
मेरे ह्रदय के डुब जाने की संभावना है ;
पर मेरे नजरो की शरारत से
आंदोंलित होती मेरी भावना है ;
धरणी की धानी चुनर ने
मेरी धीरता का हरण किया ;
मैंने इस उन्मुक्त प्रवाह को
शास्वत प्रेम मानकर वरण किया ;
मेरे निलय की ज्योति वो
वो मेरी ऊँचाई का राज है ;
तेरी वर्षा बूंदों ने छेड़ा जिसे
सबसे सुरीला वो साज है;
वही, मेरे लिए मरीचिका है बनी
मिलन पथ पर धुंध कितनी है घनी;
चाँदनी पूरित रात देखकर सब सोचते
अम्बर कितना अल्हड अलबेला है !
पर तारों की जगमग महफ़िल में
अम्बर यहाँ कितना अकेला है!
इसलिए मिलन हेतु ह्रदय का भाव
गलित होकर बरसना चाहता है ;
मेरी काया का हर रक्त अंश
बूंद रूप में सरसना चाहता है;
ऐ वारिद , बना मुझे वारि
मेरी तृष्णा मिटा दो
मेरे प्रियतम के ह्रदय को
एक बरसती घटा दो
- अभिषेक कुमार सिन्हा
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