शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

वर्षा - क्षितिज

वर्षा - क्षितिज

वारिद ,बरसा ऐसा वारि

भर दे धरणी की क्याँरी क्याँरी;

सरिता में भावना सी उफान हो

हृदय में संवेदना का तूफान हो ;

व्योम धरा के इस मधुर मिलन में

प्रतीत हो हर सुरभि न्यारी;

वारिद ,बरसा ऐसा वारि

मुझे भी ले चल संग अपने

उन्मुक्तता में देखूँ सपने ,

कर अपने अल्हड़पन का अंशदान;

करा मुझे दीवानगी का ज्ञान

मेरे मन की चंचलता को

अपने शिलाओं संग उड़ने दे ;

मेरे ह्रदय की वेदना का संताप

गलित होकर बरसने दे ;

मैं क्षितिज की राह देखता आकाश

मेरे दृगो में है आकंठ प्यास ;

धरा की कंचन काया की कमनीयता

करती है मेरे ह्रदय पर प्रहार ;

उसकी सरस वाणी की मधुरता

जैसे बसंत की रंगीन बयार ;

उनके स्नेहिल पंखों के सदृश नयन

उसके अनंत में खोता मेरा मन ;

उनके रूप यौवन की झील में ,

मेरे ह्रदय के डुब जाने की संभावना है ;

पर मेरे नजरो की शरारत से

आंदोंलित होती मेरी भावना है ;

धरणी की धानी चुनर ने

मेरी धीरता का हरण किया ;

मैंने इस उन्मुक्त प्रवाह को

शास्वत प्रेम मानकर वरण किया ;

मेरे निलय की ज्योति वो

वो मेरी ऊँचाई का राज है ;

तेरी वर्षा बूंदों ने छेड़ा जिसे

सबसे सुरीला वो साज है;

वही, मेरे लिए मरीचिका है बनी

मिलन पथ पर धुंध कितनी है घनी;

चाँदनी पूरित रात देखकर सब सोचते

अम्बर कितना अल्हड अलबेला है !

पर तारों की जगमग महफ़िल में

अम्बर यहाँ कितना अकेला है!

इसलिए मिलन हेतु ह्रदय का भाव

गलित होकर बरसना चाहता है ;

मेरी काया का हर रक्त अंश

बूंद रूप में सरसना चाहता है;

वारिद , बना मुझे वारि

मेरी तृष्णा मिटा दो

मेरे प्रियतम के ह्रदय को

एक बरसती घटा दो

- अभिषेक कुमार सिन्हा


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