शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं

प्रणय-याचना

शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं ,

तुम्हें पाने की लालसा लिप्सा है या नहीं ;

तुम्हें ढूंढता जीवन-पथ में भटका मैं हर कहीं,

पर निराशा में तुम्हारी कामना हर बार करते हैं !

शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !

मैं ये नहीं कहता कि तुम कामना की देवी हो ,

वो तो हर बार हर नज़र बदलती है;

यह सच स्वीकारने वाला मैं अकेला ही सही ,

हरेक सजग काया देखर कामना मचलती है ;

पर हरेक में तुम्हारा प्रतिबिंब ढूंढता हूँ

हरेक के साथ यही गलती हर बार करते हैं !

शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !

तुम कहोगे कि यह प्रणय कैसा है?

स्वीकारना भी एक प्रश्न चिह्न जैसा है ?

प्रेम-स्वीकारोक्ति में ये शायद कैसा है ?

तो सुनो मेरे मन में प्रेम अवधारणा ऐसा है

प्रेम मित्रता का वृह्त् विस्तार है शायद

या परस्पर आकर्षण इसका आधार है शायद ;

शायद यह हमराहों के बीच पनपता है,

या गुण दर्शन पर दिल में जगता है ?

ये स्वरूप है या रस्ते मुझे पता नहीं

पर तुम जान प्रेम जानने की लालसा हर बार करते है !

शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !

नाही मैं प्रेम में बलिदान को तैयार हूँ

सांसारिक मोह से घिरा मैं एक लाचार हूँ ;

अलौकिक प्रेम के स्वरूप का मुझे पता नहीं

पर इस लोक में तुम्हारी कामना हर बार करते है !

शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !

चाहा तुम्हारे साथ के बजाय तेरी खुशी माँगू ,

पर खुदगर्ज दिल से ऐसा हुआ ही नहीं

बडे दिलवाले ऐसा कहते है मगर

प्यार के बदले प्यार चाहना कोई खता तो नहीं;

दुनिया ने कहा मुझे खुदगर्ज कहा मगर

ये तमगा हम खुँशी से स्वीकार करते है !

शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !

- अभिषेक कुमार सिन्हा

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