प्रणय-याचना
शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं ,
तुम्हें पाने की लालसा लिप्सा है या नहीं ;
तुम्हें ढूंढता जीवन-पथ में भटका मैं हर कहीं,
पर निराशा में तुम्हारी कामना हर बार करते हैं !
शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !
मैं ये नहीं कहता कि तुम कामना की देवी हो ,
वो तो हर बार हर नज़र बदलती है;
यह सच स्वीकारने वाला मैं अकेला ही सही ,
हरेक सजग काया देखर कामना मचलती है ;
पर हरेक में तुम्हारा प्रतिबिंब ढूंढता हूँ
हरेक के साथ यही गलती हर बार करते हैं !
शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !
तुम कहोगे कि यह प्रणय कैसा है?
स्वीकारना भी एक प्रश्न चिह्न जैसा है ?
प्रेम-स्वीकारोक्ति में ये शायद कैसा है ?
तो सुनो मेरे मन में प्रेम अवधारणा ऐसा है
प्रेम मित्रता का वृह्त् विस्तार है शायद
या परस्पर आकर्षण इसका आधार है शायद ;
शायद यह हमराहों के बीच पनपता है,
या गुण दर्शन पर दिल में जगता है ?
ये स्वरूप है या रस्ते मुझे पता नहीं
पर तुम जान प्रेम जानने की लालसा हर बार करते है !
शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !
नाही मैं प्रेम में बलिदान को तैयार हूँ
सांसारिक मोह से घिरा मैं एक लाचार हूँ ;
अलौकिक प्रेम के स्वरूप का मुझे पता नहीं
पर इस लोक में तुम्हारी कामना हर बार करते है !
शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !
चाहा तुम्हारे साथ के बजाय तेरी खुशी माँगू ,
पर खुदगर्ज दिल से ऐसा हुआ ही नहीं
बडे दिलवाले ऐसा कहते है मगर
प्यार के बदले प्यार चाहना कोई खता तो नहीं;
दुनिया ने कहा मुझे खुदगर्ज कहा मगर
ये तमगा हम खुँशी से स्वीकार करते है !
शायद हम तुम्हें प्यार करते हैं !
- अभिषेक कुमार सिन्हा
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