गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

समीक्षा


तन्हाई तू शाश्वत कविता है

मोहब्बत एक अबूझ पहेली है

हमने सुना था इश्क में साथ मगर

हमारी कथा तो बिलकुल अकेली है

ऐसा नहीं है कि हम किसी के

कोई कभी हमारे नहीं हुए

हाँ जिसकी कश्ती में थे सवार

उस दरिया के कभी किनारे नहीं हुए

किसे दोष दूँ ,कभी समझ नहीं आया

कभी खुद को,तो कभी उसे दोषी पाया

जब परखा तो प्यार में हमने

खुद को ही लाभ हानि जोड़ते पाया

शायद हमारे प्यार में सवाल ज्यादा था

या कहें पूर्णता का ख्याल ज्यादा था

खुद अपूर्ण था हर कोई लेकिन

दूसरे की अपूर्णता पर बवाल ज्यादा था

- अभिषेक कुमार सिन्हा

0 टिप्पणियाँ: