तन्हाई तू शाश्वत कविता है
मोहब्बत एक अबूझ पहेली है
हमने सुना था इश्क में साथ मगर
हमारी कथा तो बिलकुल अकेली है
ऐसा नहीं है कि हम किसी के
कोई कभी हमारे नहीं हुए
हाँ जिसकी कश्ती में थे सवार
उस दरिया के कभी किनारे नहीं हुए
किसे दोष दूँ ,कभी समझ नहीं आया
कभी खुद को,तो कभी उसे दोषी पाया
जब परखा तो प्यार में हमने
खुद को ही लाभ हानि जोड़ते पाया
शायद हमारे प्यार में सवाल ज्यादा था
या कहें पूर्णता का ख्याल ज्यादा था
खुद अपूर्ण था हर कोई लेकिन
दूसरे की अपूर्णता पर बवाल ज्यादा था
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